वन्यजीवों की तस्करी पर संघ की निगाह


भोपाल प्रदेश के जंगल अंतरराष्ट्रीय तस्करों के अड्डे बन रहे हैं। इस नेटवर्क में जंगलों में मौजूद महंगे रिसॉर्ट्स भी अहम कड़ी बने हुए हैं, जो मोटी रकम के बदले विदेशियों को मनमानी सुविधाएं दिला रहे हैं।
यह खुलासा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के मुखपत्र ‘ऑर्गनाइजर’ के 19 जुलाई के अंक में किया गया है। मध्यप्रदेश की जैव विविधता पर मंडरा रहे खतरों को विस्तार से संघ के इस मुखपत्र में उजागर किया गया है। पत्र की रिपोर्ट में चार हजार वर्ग किमी में फैले सतपुड़ा के जंगलों को मध्य भारत की जैव विविधता का खजाना बताते हुए कहा गया है कि यहां के सैकड़ों दुर्लभ जीव और वनस्पति अपराध जगत की चपेट में है।
हाल ही में करोड़ों रुपयों का निवेश यहां बेहद मंहगे रिजॉर्ट्स बनाने में किया गया है, जो नेचर वॉक के नाम पर विदेशियों को संरक्षित वनों में पैदल भ्रमण के लिए खुला न्यौता दे रहे हैं। इस कारोबार में पार्क के संचालक एनएस डुंगरियाल की भूमिका पर भी सवाल खड़े किए गए हैं। पार्क में बाघों के प्रजनन के सुरक्षित ठिकानों तक सैलानियों को खुले घूमने की इजाजत दी गई है।
आर्गेनाइजर के वाइल्ड लाइफ विशेषज्ञ प्रतिनिधि संगीत वर्मा की रिपोर्ट कहती है कि अगर यही हालात रहे तो पन्ना टाइगर रिजर्व के बाद सतपुड़ा भी तबाही के मुहाने पर खड़ा है। जंगलों को खास विदेशी मेहमानों के लिए दूसरे रिजॉर्ट्स की तुलना में दस गुना ज्यादा कीमत पर सुरक्षित सैरगाह में तब्दील कर दिया गया है।
जंगल में तस्करी
फ्रेंच विद्यार्थियों का एक समूह पश्चिम बंगाल के जंगलों में जुलाई 2008 में अल्ट्रावायलेट लैंपों और चादरों के साथ पकड़ा गया। ये लोग जंगलों में दुर्लभ कीटों को पकड़ते थे। अगस्त 2008 में चेकोस्लोवाकिया के पीटर स्वेचा और इमिल कुसेरा पश्चिम बंगाल में ही दुर्लभ कीटों को जमा करते हुए रंगे हाथों पकड़े गए थे, जिन्हें कोर्ट से सजा मिली।
लुटेरों का लक्ष्य
यह रिपोर्ट कहती है कि अपनी समृद्घ जैव विविधता के लिए भारत दुनिया के 12 बड़े देशों में शामिल है, जहां वनस्पतियों की 45 हजार प्रकार किस्में और जीव-जंतुओं की 89 हजार प्रजातियां पाई जाती हैं। हर साल पर्यावरण संपदा के सैकड़ों लुटेरे इस विरासत को लूटने भारत आते हैं। बड़े और प्रभावशाली रिसॉर्ट्स मालिक इनके मददगार बने हुए हैं। कम लोगों को पता होगा कि जहरीली भारतीय बड़ी मकड़ी की कीमत एक हजार डॉलर से ज्यादा है और केसर-ए-हिंद नाम की तितली डेढ़ हजार डॉलर से ज्यादा कीमत देती है। जीव-जंतुओं की बेशकीमती नस्लों और इनकी अविश्वसनीय कीमतों की फेहरिस्त काफी लंबी है। बताया गया है कि विदेशों में इन छोटे एवं दुर्लभ जीवों का दुरुपयोग जेनेटिक कोडिंग में होता है।

1 टिप्पणियाँ:

दिगम्बर नासवा 20 जुलाई 2009 को 6:47 pm  

Thos kaaryvaahi ho to koi baat hai.....mudde to sab uthaate hi rahte hain....

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