जुझारू नेतृत्व की जरूरत-तरुण विजय


पिछले सप्ताह कोलकाता में वीर सावरकर जयंती समारोह के निमित्ता आना हुआ तो यहा के बदले माहौल को देखकर अच्छा लगा। पश्चिम बंगाल में काग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और भाजपा को मिलाकर 50.76 प्रतिशत मत मिले हैं और मा‌र्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के एकछत्र वर्चस्व को तीन दशक बाद वास्तविक चुनौती मिली। यदि भाजपा केवोट भी माकपा विरोधी मोर्चे में जोडें़ तो वाम मोर्चे का सफाया सुनिश्चित हो जाता। जिस प्रदेश ने विश्व को महान समाज सुधारक, धर्मोद्धारक, राष्ट्रीय चेतना से परिपूर्ण वैज्ञानिक और क्रांतिकारी दिए वहा लेनिन, स्टालिन और माओत्से तुंग की उपासना का अभारतीय चलन अब अस्ताचलगामी है। इसलिए विवेकानंद, सुभाषचंद्र बोस और श्यामा प्रसाद मुखर्जी की धरती पर वीर सावरकर का स्मरण स्वाभाविक और नवचैतन्य द्योतक ही था। यहा के राष्ट्रवादी बंगाल में काग्रेस तथा ममता बनर्जी की जीत राष्ट्रीय विचारों की ही जीत मानते हैं। भाजपा के उम्मीदवारों ने भी बहुत अच्छी लड़ाई लड़ी।
यह है सावरकर का पथ-जितनी सघन चुनौतिया और संकट उतनी ही अडिग हमारी विचारनिष्ठा तथा युद्ध का आवेग। जीतना ही है, आज नहीं तो कल, हम सफल होंगे ही, यह विश्वास यदि प्राप्त करना हो तो ममता बनर्जी का व्यक्तित्व बड़ी आशा और प्रेरणा जगाता है, उनकी जिद ऐसी कि वामपंथियों के अपार हमले झेलने के बावजूद एक बार भी उन्होंने वामपंथियों को परास्त करने का अपना ध्येय नहीं बदला। उन्होंने दिखा दिया कि ईमानदारी, जुझारूपन, सादा जीवन तथा जिद के साथ अगर चलें तो मंजिल अपने बूते पर मिल सकती है। उनके बारे में अस्थिर-मन या उद्योग विरोधी जैसे आक्षेप लगाने वालों को अपने भीतर छिपे क्षुद्र अहंकार को देखना चाहिए।
यह कार्यकर्ता के उस मन की भी झलक देता है जो अविजेय, अचल निष्ठा के साथ नेतृत्व को क्षत-विक्षत होते हुए भी ध्वज उठाए खड़े देखना चाहता है। अगर ऐसा ध्येयनिष्ठ, स्थिरचित्ता नेतृत्व मिले तो कार्यकर्ता जान लड़ा देते हैं, पर जीत-हार की परवाह किए बिना स्वयं स्वीकृत ध्येयपथ पर बढ़ते जाते हैं। जम्मू से केरल तक राष्ट्रीय विचारधारा के लिए बलिदान होने वाले उन कार्यकर्ताओं का जीवन यही बताता है कि यदि नेतृत्व खरा और संघर्ष दुविधा रहित आह्वान से संचालित हो तो जाति-पात के भेद भूलकर नौजवान शहीद होने आगे आते ही हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिंदू परिषद और जनसंघ व हिंदुत्वनिष्ठा वाली भाजपा के जिन कार्यकर्ताओं ने अयोध्या आदोलन, कासरगोड या तेल्लीचेरी के संघषरें में अपनी जान दी, क्या उनकी जाति से उनका स्मरण होता है या वैचारिक निष्ठा की पुण्यप्रभा उन्हें आलोकित करती है? जो लोग यह समझते हैं वे हारने पर ईमानदार मीमंासा तथा अपने दोष खुले तौर पर स्वीकार करते हुए विचार पथ के लिए अपनी निष्ठा व्यक्त करते हैं वे यह कहते हुए कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाते हैं कि इस बार कुछ कम रहे तो क्या हुआ, अगली बार हम सिर्फ अपनी ताकत पर आने के लिए अभी से कमर कस लेते हैं। लोकमान्य तिलक ने अंग्रेजी सल्तनत के तमाम आघातों, कारावास तथा अपने पत्र केसरी पर प्रतिबंध को सहा, लेकिन समझौता नहीं किया और जब छूटे तो केसरी में उनका संपादकीय 'पुनश्च हरिओम्' देशभक्तों के हृदय में नया ज्वार पैदा कर गया। जो शीर्ष पर बैठते हैं उन पर अपने सामान्य कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाते रहने की नैतिक जिम्मेदारी होती है। वह कार्यकर्ता सिर्फ 'भीड़' नहीं हुआ करता जो अपने व्यवसाय और पारिवारिक व्यस्तताओं के बावजूद पार्टी के लिए काम करने और समय व धन देने का का मन बनाता है।
ममता बनर्जी के कार्यकर्ताओं को बंगाल में अपाहिज बना दिया गया, उन्हें जिंदा जलाया गया, दुष्कर्म किया गया, फिर भी वे माकपा विरोध से डरे नहीं, क्योंकि वे जब भी अपने नेता की ओर देखते थे तो उन्हें पारदर्शी अदम्य साहस, हिम्मत और जीतने की जिद दिखती थी। कुछ वर्ष पूर्व मैं अपनी माताजी को रामेश्वरम् और कन्याकुमारी दर्शन के लिए ले गया था। हमने संघ कार्यालय से एक कार्यकर्ता के नाम से चिट्ठी ली और हम उनके यहा रुके। वे हमसे कभी नहीं मिले थे और न ही उन्हें हिंदी या अंग्रेजी आती थी। वे सिर्फ मलयालम में बोलते, हम हिंदी में, पर आत्मीयता का ऐसा बंधन था कि वे सगे भाई से भी बढ़कर रहे। क्यों थी यह आत्मीयता? इसलिए, क्योंकि हमारे बीच संघ के स्वयंसेवक होने की निष्ठा ने सगेपन का सेतु बाध दिया था। केरल, आंध्र प्रदेश व अयोध्या में सैकड़ों स्वयंसेवक केवल विचारधारा पर अडिग रहने के कारण शहीद हो गए। वे लोग तो कभी दिल्ली संसद-दर्शन तक के लिए उन आधुनिक पुरोधाओं को परेशान करने नहीं आते जो विचारधारा का क ख ग न जानते हुए भी उपदेश देने लगते हैं कि विचारधारा का आज की राजनीति में कोई महत्व नहीं है।
डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जीवन में कभी भी मूल्यों से समझौता नहीं किया और जब मतभेद तीव्र हुए तब उन्होंने सत्ता त्यागी। वह आज भी एक विचारनिष्ठ कार्यकर्ता वर्ग के आदर्श प्रेरणा स्त्रोत हैं। देश चाहे भारत हो, रूस हो या अमेरिका, वह त्याग तथा असमझौतावादी वीरोचित संघर्ष को महत्व देता है। ओबामा और पुतिन को मिला अपार जनसमर्थन इसका प्रमाण है। भारत भी उसी दिशा में बढ़ता दिखता है। भारत नई गति और नए स्पंदन के साथ विभिन्न विचारों व दलों के युवा चेहरों को ज्ञान, उद्योग, अभियात्रिकी, चिकित्सा, पत्रकारिता के साथ-साथ राजनीति में आगे बढ़ते देखता है तो विश्वास होता है कि इस देश की नई गति को नए प्राण मिल रहे हैं। ठहराव के प्रतीकों को पीछे छोड़ देश के युवा नई भाषा, नए मुहावरे और नए कीर्तिमान रचते हुए आगे बढ़ रहे हैं। फिर यह जरूरी नहीं माना जाए कि जो भी अच्छा काम करे वह जब तक हमारे संगठन की सदस्यता का फार्म न भरे तब तक हम उसकी प्रशसा नहीं करेंगे।
[तरुण विजय: लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं]


1 टिप्पणियाँ:

दिल दुखता है... 4 जून 2009 को 3:46 pm  

bilkul thik kaha apne... bangal ki janta ki aankein khul rahi hai.. comunist ke kaale shasan se wo bahar aana chahte hai... chunav parinam usi ka sanket hai...

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