चुनाव के लड्डू

भारत में जब भी चुनाव आते है देश के असली भिखारी भीख मांगने हमारे घर पर चले आते है और चुनावी वादे भी करते है जो कभी पूरी नही हो सकती मैंने कभी अपने दादा से सुना था की चावल २ रुपए किलो मिलती थी सपने में नही सोचा था के चावल २ रुपए किलो मिलेंगे फ़िर भी मिले या न मिले जब चुनाव आते है एक आस बंध जरुर जाती है ये तो हमारी नेता का कमाल है वरना सपने में भी नही सोच सकते ये २ रुपए चावल भाजपा दे रहे है लेकिन इससे एक कदम आगे कांग्रेस निकल गई है मुझे तो ऐसी आशा नही थी हमारी आजादी वाली पार्टी से लेकिन बोल दिया तो बोल दिया १ रुपए किलो चावल | ये तो हमारे नेता का कमाल है गरीब जनता बेवकूफ नही है ४ साल २० रुपए किलो में चावल ख़रीदे और चुनाव में २ रुपए किलो मिलने के वादे कहने में क्या जाता है नेता चुनाव में कह जाते है अगर छत्तीसगढ़ में चुनाव जितने के लिए क्या हमारे नेताओ को चावल ही मिले हा भाई जनता के पेट से जुडा लेकिन हमारी नेताओ को ये क्यों नही समझ आती है की देश में चावल से जरुरी चीज गरीब है अगर उनके पास कमाने के साधन ही नही रहेंगे तो पैसा कहा से आएगा भले आप २ रुपए में चावल दे या १ रुपए में दे चुनाव में जनता इसलिए वोट देती है की हमारा भला होगा लेकिन इस चुनाव में नेताओ का भला हो जाता है जब सरकार में हमारे नेता जीत कर जाते है वो सिर्फ़ यही सोचता है ५ साल में जितना लूटना है लूटलो पता नही फिर मौका मिले या न मिले | जनता के पास एक साइकिल नही होती है लेकिन नेताओ के पास BMW से लेकर न जाने क्या क्या गाड़ी होती है जनता के पास एक अदद्द घर नही होता है लेकिन नेताओ के पास आलिशान मकान होते है जनता तो जानता है फिर भी नही मानता है वोट करो ये आपका अधिकार है पैसा लोटो ये नेताओ का अधिकार है | मैं तो एक गीत गुनगुनाना चाहता जो मीरा बाई अक्सर गया करती थी "दर्द न जाने कोए , घायल की गति घायल जाने और न जाने कोई"
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1 टिप्पणियाँ:

ummed Singh Baid "saadahak " 19 नवंबर 2008 को 11:44 pm  

चावल दो रुपये किलो,चला चुनावी जंग.
कँग्रेस और बी.जे.पी. दोनो करते जंग.
दोनो करते जंग, करें सब झूठे वादे.
जनता समझ रही नेता के दुष्ट इरादे.
कह साधक कवि,वोट-तन्त्र का दोष है सारा.
अच्छे-अच्छों से बुलवा दे, झूठ ही सारा.

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